शार्ङ्गधरसंहिता
सार्ङगधरसंहिता, आयुर्वेद का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसके रचयिता शार्ङ्गधर हैं। इसकी रचना १२वीं शताब्दी में हुई थी। इसमें तीन खण्ड हैं - प्रथम खण्ड, मध्यम खण्ड तथा उत्तर खण्ड। श्री शार्ंगधराचार्य ने इस ग्रन्थ की विषयवस्तु को प्राचीन आर्ष ग्रन्थों (चरक एवं सुश्रुत संहिताओं तथा कुछ रसायनशास्त्रीय ग्रन्थों) से संग्रह करके इसमें साररूप में प्रस्तुत किया है। इस ग्रन्थ पर कम से कम तीन टीकाएं हैं- हरि स्वामी, सायन और कवीन्द्र के भाष्य।
आचार्य ने इसकी भाषा को सरल एवं समझने योग्य रखा है। वे इसमें अति विस्तार से बचे हैं।[1]
शार्ङ्गधरसंहिता, लघुत्रयी का एक महत्वपूर्ण संहिता है। इस संहिता में आयुर्वेद की विषयवस्तु चरक संहिता एवं सुश्रुत संहिता से ली गयी है।
महत्व एवं विशेषता
मध्यकाल की यह एक मात्र संहिता है। नाड़ी ज्ञान द्वारा रोग-परीक्षा आयुर्वेद शास्त्र की एक विलक्षण विद्या है। कुशल वैद्यों द्वारा नाड़ी में सूत (धागा) के एक सिरे को बांधकर, दूसरे सिरे को पकड़कर नाड़ी गति का ज्ञान करके, रोग एवं रोगी के सम्बन्ध में सब कुछ सत्य-सत्य बता देने की घटना प्रसिद्ध है। नाडीशास्त्र के प्राचिन आचार्यो में कणाद आदि का नाम आता हैं। इसी परम्परा क्रम में आचार्य शार्ङ्गधर भी हैं जो नाड़ी शास्त्रज्ञ कहे गये है। शार्ङ्गधर ने अपने पूर्वविर्ती समय के उपलब्ध सभी ग्रन्थों का सम्यक आलोचन एवं सूक्ष्म निरिक्षण करके एक विकसित ग्रन्थ का निमार्ण किया है। कुल ३ खण्डों में और ३२ अध्यायों सहित संपूर्ण विषयों का वर्णन किया है।
मध्य काल की यह एक मात्र संहिता है। उस काल में चिकित्सा की प्रधानता थी, तथा इस समय राजपूत और मुगल दोनों का शासन था। तांत्रिक और सिद्ध संप्रदाय अपने चर्मोत्कर्ष पर थे, अतः मध्य काल से पूर्ण प्रभावित होने के कारण यह संहिता काफी लोकप्रिय हुई थी।
इसमें वर्णित विषयों की निम्न विशेषताएं हैं-
1. राशि भेद से ऋतुओं का विभाजन।
2. नाड़ी परीक्षा का सर्वप्रथम वर्णन।
3. दीपन पाचन, शुक स्तम्भन, पुरीष स्तम्भन आदि नाम से औषधियों का वर्गीकरण तथा मात्रा आदि का विचार है।
4. दोष धातु मल की निरूक्ति, दोषों के प्रकार, उनकी प्रधानता, धातुओं का पोषण क्रम, विष्णु पादामृत या आक्सीजन का शरीर के भीतर तृप्त होना, पाचन क्रिया एवं मूत्र निर्माण का वर्णन है।
5. रक्त को भी दोष मानकर एवं रोगों के भेद का वर्णन एवं कृमियों के 20 भेदों के अतिरिक्त स्नायुक कृमि का वर्णन ।
6. रोगों का वर्गीकरण विस्तार से किया गया है, जैसे आमवात का 4 प्रकार।
7. दृष्टि रोग और गर्भ दोष के 8 भेद, स्त्री रोग के तीन भेद तथा शीतोपद्रव, शल्योपद्रव, क्षार उपद्रव आदि का वर्णन।
8. चिकित्सा में विषों का प्रयोग जैसे- वत्सनाभ आदि विषों का प्रयोग, जैसे- कृष्ण सर्प विष, विष के वेगों का वर्णन ।
9. धातुओं का शोधन, मारण, अनेक रस औषधियों का निर्माण एवं प्रयोग का वर्णन किया गया है।
10. शार्ङ्गधरसंहिता में चरक, सुश्रुत, वाग्भट्ट, चक्रद्रप्त और सौढ़ल के प्राचीन ग्रंथों का एवं रस शास्त्र के प्राचीन ग्रंथों का संकलित रूप है।
11. प्राचीन आयुवैदिक संहिताओं से हटकर नाड़ी विज्ञान का विस्तृत वर्णन प्राप्त है।
सन्दर्भ
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बाहरी कड़ियाँ
- शार्ंगधरसंहिता (संस्कृत विकिस्रोत)
- शार्ङ्गधरसंहिता (यूनिकोड देवनागरी में)
- शार्ङ्गधरसंहिता
- शार्ङ्गधरसंहिता (हिन्दी व्याख्या - ब्रह्मानन्द त्रिपाठी)
श्रेणी:आयुर्वेद श्रेणी:संस्कृत ग्रन्थ
- ↑ "Sarngadhara Samhita". Archived from the original on 11 जुलाई 2016. Retrieved 5 जुलाई 2016.
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