तिरहुता लिपि
तिरहुता लिपि – मिथिला के प्राचीन लिपिक परंपरा
तिरहुता लिपि मिथिला क्षेत्रक एक ऐतिहासिक आ गौरवशाली लिपि छी, जे मैथिली भाषा लिखबाक मूल, प्राचीन माध्यम रहल अछि। ई लिपि ब्राह्मी लिपि सं उत्पन्न भेल आ समय के संग विकसित होइत-होइत एक अलग पहचान बना लेलक। तिरहुता लिपि केँ विद्वान लोकनि "मिथिला लिपि" वा "मैथिली लिपि" सेहो कहैत छथि। ऐतिहासिक रूप सं ई लिपि विशेष रूप सऽ धार्मिक ग्रंथ, पांडुलिपि, विवाह संस्कार पत्र, ज्योतिषीय गणना, एवं शिक्षा संबंधी सामग्री लिखबा में प्रयुक्त होइत छल। एकर प्रयोग मुख्यतः बुद्धिजीवी, पुरोहित, शिक्षक आ काव्य रचनाकार लोकनि करैत छलाह।
तिरहुता लिपि अपन स्वरूप में अत्यंत सौंदर्यपूर्ण, गोलाकार आ सजावटी होइत अछि। ई लिपि देवनागरी लिपि सँ किछु मिलती-जुलती जरूर अछि, लेकिन एकर अक्षर अधिक कलात्मक होइत अछि। तिरहुता में हर वर्ण स्पष्ट रूप सऽ अलग-अलग खींचल जाइत अछि, जे पढ़ैवाला के आँखि के आराम दैत अछि। एकर लेखन दिशा बाएँ सँ दाहिना होइत अछि, आ प्रत्येक वर्ण के संग स्वर चिह्न जोड़बाक परंपरा अछि, जे एकरा उच्चारण में स्पष्टता दैत अछि। पांडुलिपि सभ में तिरहुता लिपि के उपयोग देखल जाए छै, जे मिथिला के गौरवशाली साहित्यिक धरोहर के झलक देत अछि।
मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, आ नेपालक तराई क्षेत्र (जैसे जनकपुर) में तिरहुता लिपि के उपयोग बहुत आम छल। एहि लिपि में लिखल पुरातन हस्तलिखित ग्रंथ आजुक संग्रहालय आ निजी पुस्तकालय सभ में संरक्षित अछि। 14वीं सदीक महाकवि विद्यापति ठाकुर स्वयं अपन काव्य रचना तिरहुता लिपि में लिखने छलाह। विद्यापति के पदावली, गीत, नाट्य, आ देवी-स्तुति सभ के पांडुलिपि आज सेहो तिरहुता में उपलब्ध अछि।
कालांतर में जब ब्रिटिश शासन के समय अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था बढ़ल आ देवनागरी लिपि के सरकारी स्तर पर मान्यता देल गेल, तऽ तिरहुता लिपि धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन सं लोप होमय लागल। स्कूल-कॉलेज में देवनागरी के पढ़ायल जेबाक कारण मैथिली लिखबा में तिरहुता के प्रयोग लगभग बंद भऽ गेल। तथापि, किछु पुरोहित वर्ग आ परंपरागत विद्वान लोकनि विवाह पत्र, पूजा-पाठ, कुलाचार संबंधी लेखन में एकर प्रयोग करैत रहलाह।
वर्तमान में, तिरहुता लिपि के संरक्षण आ पुनर्जीवन के दिशा में प्रयास जारी अछि। Unicode Consortium द्वारा तिरहुता लिपि के 2014 में आधिकारिक यूनिकोड मान्यता देल गेल, जे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि छल। एहि सं तिरहुता लिपि में डिजिटल टाइपिंग, सॉफ्टवेयर विकास आ ऑनलाइन प्रकाशन संभव भेल। कतेको संस्था, शोधकर्ता आ मैथिली प्रेमी लोकनि तिरहुता सिखबाक आ सिखेबाक अभियान चला रहल छथि। एकर माध्यम सं नव पीढ़ी अपन भाषा आ लिपिक इतिहास सं पुनः जुड़ि रहल अछि।
इतिहास
तिरहुता लिपि के इतिहास बहुत प्राचीन आ गौरवशाली रहल अछि। एकर उद्भव ब्राह्मी लिपि सं मानल जाइत अछि, जे भारतीय उपमहाद्वीपक सबसँ पुरान लिपि छी। ब्राह्मी सं नागरी, शारदा, बंगला, मैथिली, गुजराती आदि लिपि विकसित भेल, आ तिरहुता लिपि ओहि परंपरा के एक महत्त्वपूर्ण शाखा बनल। ब्राह्मी लिपि सऽ उत्पन्न भेला उपरांत, तिरहुता धीरे-धीरे अपन विशिष्ट रूप लेलक, जाहि में गोलाकार आ अलंकृत वर्ण होइत छल। प्राचीन काल में मिथिला एक प्रमुख शैक्षिक, धार्मिक आ सांस्कृतिक केंद्र रहल, आ ओहिना तिरहुता लिपि सेहो विद्या के संवाहक बनि गेल।
माना जाइत अछि जे 9वीं सँ 14वीं शताब्दी तक तिरहुता लिपि अपन चरम पर रहल। विशेष रूपेण 14वीं शताब्दी में कवि विद्यापति के लेखन कार्य तिरहुता लिपि में भेल, जे एकर साहित्यिक महत्त्व के प्रमाण अछि। विद्यापति अपन पदावली, भक्ति गीत, दरबारी कविता आ संस्कृत ग्रंथ सभ में तिरहुता लिपिक उपयोग केलनि। ओहिठाम सँ तिरहुता लिपि केवल धार्मिक या पांडित्य वर्ग तक सीमित नहि रहल, बल्कि आम जनजीवन, विवाह पत्र, ज्योतिषीय गणना, जमीनक कागजात, आ शिक्षण कार्य में सेहो प्रयुक्त होमय लगल।
‘तिरहुता’ शब्द अपन नाम मिथिला क्षेत्रक प्राचीन नाम ‘तिरहुत’ सं पाओल अछि। ई लिपि मुख्यतः मिथिलांचल (वर्तमान बिहारक उत्तर भाग), दक्षिण नेपालक तराई क्षेत्र (जइमे जनकपुर प्रमुख छी), आ उत्तर बिहार में प्रचलित छल। ओहि समय में तिरहुत एक प्रशासनिक, सांस्कृतिक आ शिक्षण केंद्र छल, जाहि कारण लिपि सेहो ओतबे प्रसिद्ध भेल। दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा, आ जनकपुर क्षेत्र में ई लिपि खास रूप सऽ अपन उपयोग बनौने रहल।
तिरहुता लिपि के विशेषता ई छल जे ई देवनागरी लिपि सऽ मेल खाइत, मुदा ओकर वर्ण अधिक सजावटी, वक्र (curved) आ कलात्मक रूप में होइत छल। हस्तलिखित ग्रंथ में तिरहुता लिपि के अक्षर सौंदर्यपूर्ण ढंग सऽ बनाओल जाइत छल, जाहि में लेखनकर्ता के शुद्धता आ हस्तकला सेहो झलकैत छल। ई लिपि पांडुलिपि लेखन, ताम्रपत्र अभिलेख, धार्मिक मंत्र लेखन, आ गुप्त विवाहपत्रिका तैयार करबाक प्रमुख साधन छल।
यद्यपि कालांतर में विशेष रूप सऽ ब्रिटिश शासनकाल आ देवनागरी लिपिक प्रचार के कारण तिरहुता के प्रयोग में गिरावट आएल, मुदा एकर सांस्कृतिक आ भाषिक महत्त्व कखनो समाप्त नहि भेल। एखनहुँ मिथिला के किछु इलाका आ खास कऽ नेपाली तराई क्षेत्र में वृद्ध पंडित लोकनि द्वारा तिरहुता लिपि के प्रयोग धार्मिक कार्य हेतु कएल जाइत अछि। डिजिटल युग में पुनः ई लिपि के संरक्षित करबाक आ नव पीढ़ी में प्रचार-प्रसार करबाक कोशिश तेज भेल अछि, जे स्वागतयोग्य प्रयास छी।
विशेषताएँ
- तिरहुता लिपि देवनागरी लिपि सँ मिलती-जुलती अछि, मुदा एकर अक्षर अधिक गोलाकार आ सजावटी होइत अछि।
- ई लिपि बाँए सँ दाहिने पढ़ल जाइत अछि।
- प्रत्येक व्यंजन में मातृका जोड़ि कऽ स्वर के अभिव्यक्ति करब तिरहुता के महत्वपूर्ण लक्षण छी।
वर्तमान स्थिति
आजुक समय में तिरहुता लिपि के दैनिक उपयोग नगण्य भऽ गेल अछि, आ मैथिली भाषा में लिखनाय देवनागरी लिपि में होइत अछि। तथापि, मिथिला आ नेपालक कुछ क्षेत्र में तिरहुता लिपि के संरक्षण आ पुनरुत्थान लेल प्रयास कएल जा रहल अछि। कतेको शोध संस्थान, विश्वविद्यालय आ स्वयंसेवी संस्था एहि लिपिक डिजिटलीकरण, शिक्षा आ प्रशिक्षण पर कार्य कऽ रहल अछि।
सांस्कृतिक महत्व
तिरहुता लिपि केवल लेखनक माध्यम नहि, बल्कि मिथिला के सांस्कृतिक अस्मिता के प्रतीक अछि। ई लिपि मिथिला के गौरवशाली शैक्षिक, धार्मिक आ साहित्यिक परंपरा के साक्षी रहल अछि। विवाह पत्र, पवित्र मंत्र, आ हस्तलिखित ग्रंथ में तिरहुता लिपि विशेष रूप सऽ प्रयोग होइत छल।
डिजिटल संरक्षण प्रयास
हाल के वर्ष में यूनिकोड कंसोर्टियम द्वारा तिरहुता लिपि के यूनिकोड ब्लॉक में शामिल कएल गेल अछि। एहि सं ई संभव भऽ रहल अछि जे कंप्यूटर, वेबसाइट, मोबाइल ऐप्स आदि में तिरहुता लिपि के पुनः प्रयोग कएल जाए।
निष्कर्ष
तिरहुता लिपि मैथिली भाषा के आत्मा सऽ जुड़ल लिपि छी। एकर संरक्षण आ प्रचार नव पीढ़ी लेल जरूरी अछि ताकि मिथिला के सांस्कृतिक आ भाषाई विरासत जीवित रहि सको। ई लिपि केवल भूतकालक इतिहास नहि, बल्कि भविष्यक गर्व बनि सकैत अछि।
स्रोत
- विद्यापति साहित्य संग्रह – मिथिला शोध संस्थान
- मैथिली भाषा आ लिपिक विकास – डॉ. सुरेश झा
- Unicode.org – Tirhuta Script
- तिरहुता लिपि टाइपिंग